हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एचआरटीसी के दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को आठ साल की सेवा पूरी होने के बाद नियमित करने के आदेश दिए हैं। अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसले में परिवहन निगम को आदेश दिया कि 30 जून तक या उससे पहले कर्मचारियों का नियमितीकरण किया जाए और सभी लाभ जारी किए जाएं।
यह आदेश न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने एक साथ सभी याचिकाओं का निपटारा करते हुए पारित किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं को वास्तविक वित्तीय लाभ याचिका दायर करने की तिथि से तीन साल पहले तक के दिए जाएंगे। उससे पहले के वित्तीय लाभ केवल नोशनल आधार पर माने जाएंगे।
याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट से मांग की थी कि एचआरटीसी को कर्मचारियों की प्रारंभिक नियुक्ति की तिथि से आठ साल की सेवा पूरी करने के आधार पर उनकी सेवाएं नियमित करने के निर्देश दिया जाए। उन्होंने 10 अक्टूबर 2018, 6 अप्रैल 2017, 15 अक्टूबर 2018 और 26 नवंबर 2019 को जारी निगम के आदेशों को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता निगम में चपरासी, चौकीदार, क्लर्क और स्वीपर जैसे पदों पर कार्यरत थे।
निगम ने विभिन्न तिथियों पर इन कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर दी थीं, जिसके खिलाफ उन्होंने औद्योगिक ट्रिब्यूनल-सह श्रम न्यायालय में याचिका दायर की। ट्रिब्यूनल ने उनके पक्ष में फैसला देते हुए उन्हें वरिष्ठता और सेवा की निरंतरता के साथ बहाल करने का निर्देश दिया। हालांकि, बिना किसी पिछले वेतन के। याचिका में बताया गया कि ट्रिब्यूनल के आदेशों के बाद निगम के निदेशक मंडल के समक्ष मामला रखा गया, उसके बाद भी उन्हें आठ साल की सेवा पूरी होने पर नियमित नहीं किया गया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब एक विशेष समूह को न्यायिक राहत मिलती है, तो समान परिस्थितियों में अन्य कर्मचारियों को भी वही लाभ मिलना चाहिए, अन्यथा यह भेदभाव और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा। खंडपीठ ने राज्य सरकार और उसके अधिकारियों की ओर से अस्थायी नियुक्तियों (जैसे अनुबंध, तदर्थ, दैनिक वेतन) की आड़ में कर्मचारियों का शोषण करने की प्रवृत्ति पर नाराजगी जताई। अदालत ने इसे एक शोषणकारी प्रथा बताते हुए कहा कि यह मामला भी उसी का उदाहरण है, जो राज्य की जिम्मेदारियों से बचने की प्रवृत्ति को दर्शाता है।
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