Kullu Dussehra 2026: हिमाचल की देव संस्कृति, रघुनाथ जी की रथयात्रा और सात दिवसीय उत्सव की पूरी जानकारी

Kullu Dussehra 2026

हिमाचल प्रदेश अपनी समृद्ध देव संस्कृति, लोक परंपराओं और ऐतिहासिक मेलों के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। इन्हीं में कुल्लू दशहरा का विशेष स्थान है। यह उत्सव कुल्लू घाटी की धार्मिक आस्था, देव परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का अद्भुत संगम है। देश के अन्य हिस्सों में दशहरा विजयादशमी के दिन समाप्त हो जाता है, जबकि कुल्लू में इसी दिन से दशहरा उत्सव की शुरुआत होती है।

अंतर्राष्ट्रीय दशहरा उत्सव: भगवान रघुनाथ जी के दरबार में देवी-देवताओं ने भरी हाजिरी - deities attend lord raghunath s court
अंतर्राष्ट्रीय दशहरा उत्सव: भगवान रघुनाथ जी के दरबार में देवी-देवताओं ने भरी हाजिरी
कुल्लू दशहरा के दौरान भगवान रघुनाथ जी की भव्य रथयात्रा निकाली जाती है। इसमें हिमाचल के विभिन्न क्षेत्रों से देवी-देवताओं की पालकियां भाग लेती हैं। ढालपुर मैदान में आयोजित यह उत्सव स्थानीय लोगों के साथ-साथ देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के लिए भी प्रमुख आकर्षण रहता है।

कुल्लू दशहरा का इतिहास

International Kullu Dussehra
International Kullu Dussehra

कुल्लू दशहरा का इतिहास 17वीं शताब्दी से जुड़ा है। सरकारी पर्यटन स्रोतों के अनुसार, कुल्लू के राजा जगत सिंह के शासनकाल में अयोध्या से भगवान रघुनाथ जी की प्रतिमा लाई गई और उन्हें कुल्लू रियासत का प्रमुख आराध्य देवता स्थापित किया गया। इसके बाद भगवान रघुनाथ जी की आराधना और उनसे जुड़ी परंपराओं ने कुल्लू के धार्मिक जीवन में विशेष स्थान प्राप्त किया। समय के साथ यह धार्मिक आयोजन एक बड़े देव उत्सव के रूप में विकसित हुआ। आज कुल्लू दशहरा हिमाचल प्रदेश की पहचान बन चुका है और इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जाना जाता है।

 

भगवान रघुनाथ जी की रथयात्रा क्यों है खास?

Rath Yatra of Lord Raghunath, begins, international Kullu Dussehra festival | भगवान रघुनाथ की रथ यात्रा से हुआ अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव का आगाज - Shimla News |
भगवान रघुनाथ की रथ यात्रा से हुआ अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव का आगाज

कुल्लू दशहरा की सबसे प्रमुख धार्मिक गतिविधि भगवान रघुनाथ जी की रथयात्रा है। इस अवसर पर भगवान रघुनाथ जी की सुसज्जित प्रतिमा को पारंपरिक लकड़ी के रथ में विराजमान किया जाता है। श्रद्धालु रस्सियों की सहायता से रथ को खींचते हुए ढालपुर मैदान तक ले जाते हैं।

 

यह रथयात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि कुल्लू की सामूहिक आस्था और देव परंपरा का प्रतीक भी है। स्थानीय लोग बड़ी श्रद्धा के साथ इसमें भाग लेते हैं। इसी आयोजन के साथ सात दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव का शुभारंभ होता है।

 

देव समागम: सैकड़ों देवी-देवताओं का मिलन

खुडीजल समेत बारह देवता  आठ को करेंगे कुल्लू कूच  - Dev Festival -
देव समागम: सैकड़ों देवी-देवताओं का मिलन

कुल्लू दशहरा को विशिष्ट बनाने वाली सबसे बड़ी विशेषता यहां होने वाला देव समागम है। कुल्लू घाटी और आसपास के क्षेत्रों के गांवों से देवी-देवताओं की सुसज्जित पालकियां ढालपुर मैदान पहुंचती हैं। उनके साथ पारंपरिक वाद्ययंत्र बजाने वाले कलाकार, पुजारी और श्रद्धालु भी आते हैं। इस दौरान अलग-अलग गांवों की धार्मिक परंपराएं एक ही स्थान पर दिखाई देती हैं। देवताओं का आगमन, पारंपरिक वेशभूषा, ढोल-नगाड़ों की गूंज और सामूहिक पूजा हिमाचल की देव संस्कृति को जीवंत रूप में प्रस्तुत करते हैं। आधिकारिक पर्यटन जानकारी में इस उत्सव में 200 से अधिक स्थानीय देवी-देवताओं की भागीदारी का उल्लेख मिलता है। 

 

उत्सव के प्रमुख आकर्षणों में शामिल हैं:

  • भगवान रघुनाथ जी की पारंपरिक रथयात्रा।

  • विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले देवी-देवताओं का समागम।

  • कुल्लू की प्रसिद्ध नाटी और लोकसंगीत।

  • स्थानीय हस्तशिल्प, उत्पादों और खानपान की प्रदर्शनियां।

  • भारतीय और विदेशी सांस्कृतिक दलों की प्रस्तुतियां।

  • आयोजन के निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार विशेष सांस्कृतिक और मनोरंजन गतिविधियां।

2026 के उत्सव में ड्रोन और लेजर शो भी विशेष आकर्षणों में शामिल बताए गए हैं। इनके दिन और समय के लिए आधिकारिक कार्यक्रम देखें।

कुल्लू दशहरा और हिमाचल की लोक संस्कृति

तस्वीरें:लोक संस्कृति के संरक्षण को लेकर थिरकीं सैकड़ों महिलाएं - Kullvi Nati For Preservation Of Local Culture In Kullu Himachal Pradesh -
तस्वीरें:लोक संस्कृति के संरक्षण को लेकर थिरकीं सैकड़ों महिलाएं

कुल्लू दशहरा हिमाचल प्रदेश की लोक संस्कृति को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस उत्सव में स्थानीय लोकगीत, नृत्य, पारंपरिक वाद्ययंत्र, हस्तशिल्प और क्षेत्रीय खानपान देखने को मिलता है। कुल्लू की प्रसिद्ध नाटी लोकनृत्य शैली उत्सव की सांस्कृतिक पहचान है। पारंपरिक वेशभूषा में लोग सामूहिक रूप से नृत्य करते हैं, जबकि लोकवाद्य उत्सव के माहौल को जीवंत बनाते हैं। यह आयोजन नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने और स्थानीय कलाकारों को मंच प्रदान करने का अवसर भी देता है।

 

कुल्लू दशहरा का पर्यटन और आर्थिक महत्व

कुल्लू दशहरा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक कुल्लू पहुंचते हैं। इससे होटल, टैक्सी, स्थानीय दुकानदारों, हस्तशिल्प विक्रेताओं और अन्य छोटे व्यवसायों को लाभ मिलने के अवसर पैदा होते हैं। यह उत्सव हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित करता है। पर्यटक यहां धार्मिक परंपराओं के साथ-साथ हिमालय की प्राकृतिक सुंदरता और स्थानीय जीवनशैली का अनुभव भी करते हैं। उत्सव में शामिल होने वाले लोगों को स्थानीय प्रशासन के यातायात, पार्किंग, सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन संबंधी निर्देशों का पालन करना चाहिए।

 

कुल्लू दशहरा का समापन कैसे होता है?

कुल्लू दशहरा सात दिनों तक चलने वाला उत्सव है। समापन के अवसर पर पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं और भगवान रघुनाथ जी से जुड़ी रस्में निभाई जाती हैं। परंपरा के अनुसार, उत्सव के अंतिम चरण में लंका दहन से जुड़ा आयोजन भी होता है। इस प्रकार कुल्लू दशहरा धार्मिक आस्था, लोक परंपरा और सामुदायिक सहभागिता के साथ संपन्न होता है।

 

निष्कर्ष

कुल्लू दशहरा केवल एक धार्मिक मेला नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश की सदियों पुरानी देव संस्कृति और सामूहिक आस्था का प्रतीक है। भगवान रघुनाथ जी की रथयात्रा, सैकड़ों देवी-देवताओं का समागम और लोक संस्कृति की रंगीन प्रस्तुतियां इसे देश के अन्य दशहरा उत्सवों से अलग पहचान देती हैं। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा हिमाचल की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने और उसे दुनिया तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

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Author: Ram Bhardwaj

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