हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सेवा मामलों से जुड़े एक मामले में हिमाचल प्रदेश राज्य विद्युत बोर्ड की ओर से रोस्टर नियमों की अनदेखी को पदोन्नति को अवैध और असांविधानिक करार दिया है। न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की अदालत ने फैसले में बिजली बोर्ड को निर्देश दिया है कि मूल याचिकाकर्ता को साल 2015 से काल्पनिक रूप से पदोन्नत मानकर उनके कानूनी वारिसों को सभी वित्तीय व सेवा लाभ जारी किए जाए। बिजली बोर्ड की इस कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक रोस्टर का कोई चक्र पूरा नहीं हो जाता, तब तक विभाग सीधे अगले चक्र पर छलांग नहीं लगा सकता।
बिजली बोर्ड की ओर से चौथे चक्र को पूरा किए बिना पांचवें चक्र को लागू करना पूरी तरह से अवैध, मनमाना और भेदभावपूर्ण था। कोर्ट ने कहा कि यदि मॉडल रोस्टर नियमों का इस तरह उल्लंघन किया जाएगा, तो रोस्टर नीति बनाने का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा। अदालत ने जूनियर कर्मचारी की पदोन्नति के आदेश को रद्द करते हुए बिजली बोर्ड को आदेश दिया है कि याचिकाकर्ता नगेंद्र सिंह को 27 जुलाई 2015 से फोरमैन (विशेष) के पद पर प्रमोट माना जाए। उन्हें इस पदोन्नति के आधार पर वरिष्ठता, वेतन वृद्धि और अन्य सभी सेवा लाभ काल्पनिक रूप से दिए जाए।
14 नवंबर 1985 को नियुक्त किया गया था याचिकाकर्ता
गौरतलब है कि याचिकाकर्ता नगेंद्र सिंह को 14 नवंबर 1985 को हिमाचल प्रदेश राज्य विद्युत बोर्ड में ऑयल एंड क्लीनर के पद पर नियमित नियुक्त किया गया था। जनवरी 1989 में उन्हें इलेक्ट्रिशियन और अगस्त 2005 में फोरमैन के पद पर पदोन्नत किया गया। बोर्ड के नियमों के तहत फोरमैन के पद पर आठ साल की नियमित सेवा पूरी करने वाले कर्मचारी फोरमैन के पद पर पदोन्नति के पात्र थे।
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बोर्ड ने नियमों का उल्लंघन करते हुए चौथे चक्र को बीच में ही छोड़ दिया और सीधे पांचवें चक्र को लागू कर दिया। पांचवें चक्र में दूसरा पद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित था। इसका फायदा उठाते हुए बोर्ड ने वरिष्ठता सूची में 9वें नंबर पर मौजूद एक जूनियर कर्मचारी को 27 जुलाई 2015 को फोरमैन (विशेष) के पद पर प्रमोट कर दिया, जबकि दूसरे नंबर पर मौजूद नगेंद्र सिंह के वैध दावे को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया।
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